मैं कौन हूँ? और मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

बहुत से लोग एक अतृप्त जीवन जीते हैं। जिसका न कोई केन्द्रित लक्ष्य या जिसकी न कोई निश्चित खोज होती है। वह एक खाली कैनवेस के समान होती है जिस पर एक निश्चित उद्देश्य से चित्र बनाना बाकी है। इस सबका क्या अर्थ है? एक बार ऐसा कहा गया था, कि हम सब के अन्दर परमेश्वर रूपी एक खाली स्थान है। और हम इस खाली स्थान को बहुत सी चीज़ों से भर देना चाहते हैं। जैसे कि मित्रों, फैशन, झूठे विश्वास, कपटी योजनाओं, और बहुत सी नशे में की गई कल्पनाओं से। आप केवल मेरा पीछा करें उस आखरी अनन्त गढ़े के छोर तक जहाँ पहुँच कर आप जान लें कि कुछ तो है जो बाकी है जो मिला नहीं है। देखिए उस समय से लेकर जब परमेश्वर ने वचन द्वारा सृष्टि की रचना की थी आज तक उसने हम सब मनुष्यों की रचना अपने हाथों से अपने ही स्वरूप में की है। यह उसी एक ही योजना थी कि वह स्वयं और मनुष्य एक हों। जिसमें सृष्टिकर्ता और उसकी की गई सृष्टि एक सुन्दर सम्बन्ध में जुड़ जाए। सुनने में तो यह एक दम सही लगता है? तो फिर क्या हो गया था? उत्तर है पाप।

हम स्वभाव से ही पापी हैं

पाप ने इस खाली स्थान का द्वार खोल दिया था। और वह पाप ही था जो हमें अपने सबसे अच्छे मित्र से दूर ले गया था। वह पाप ही था जिसने हमें परमेश्वर से दूर कर दिया था। और अनेक शताब्दियों से हम मनुष्य बहुत प्रयास कर रहे हैं कि इस दूरी पर एक पुल बाँध कर उसे फिर से जोड़ दें। परन्तु यह दूरी तो संसार में प्रचलित भिन्न धर्मों दार्शनिक विचारों, धन, तथा प्रचलित नैतिक निर्णयों के कारण दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। और ऐसा लगता है मानो ये दूरियाँ सदा के लिए स्थतापित हो चुकी हैं। ऐसा लगता है कि हमारे अन्दर का वह खाली स्थान जो परमेश्वर के रूप सा है वह आज भी खाली पड़ा नष्ट हो रहा था तब तक जब तक भविष्य वाणी न हुई, “आज के दिन दाऊद के शहर में तुम्हारे लिए एक उद्धारकर्ता जन्मा है। जो कि यीशु मसीह क्रीस्ट हमारे प्रभु हैं और उसे हम फटे कपड़ों में लिपटा चरनी में पड़ा पाएँगे।” परन्तु वह कोई साधारण सा बालक नहीं था जिसे हम ने बड़े होते एक लड़के के रूप में फिर एक मनुष्य और प्रचारक के रूप में एक लाखों. करोड़ों की बड़ी भीड़ को ऐसी शिक्षा देकर उनका नेतृत्व करते देखा था जो सिखाती थी, “अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप देते हैं तुम उन को आशीष दो। और यदि कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी उसकी ओर फेर दो।”।

वे एक ऐसे शिक्षक थे जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन वे कोई सामान्य प्रचारक नहीं थे। यह देख कर जाने लें कि पाप की मज़दूरी तो पाप है यीशु ने उसे दूर करके कहा था मनुष्य के लिए परमेश्वर ने एक बहुमूल्य वरदान रखा है जो कि यीशु मसीह में अनन्त जीवन है क्योंकि हमारे पापों के लिए उसने अपने प्राण देकर कीमत चुकाई थी।

उन्होंने उसके हाथों में कीलें ठोक दी थीं, उसे नकार कर उसके साथ विश्वासघात किया था। और उसे आपके और मेरे लिए 2000 साल पहले क्रूस पर ऊँचा लटकाया था।

उसकी कमर को एक भाले से छेदा गया था। परमेश्वर का पुत्र हमारा मेमना, संसार के सामने मारा गया था। उसने इस संसार में सभी मनुष्य से क्रूर और दर्दनाक मौत सही थी जो कोई भी मानव सह सकता है।

वह एक मित्र की कब्र में दफनाया गया था और तीन दिनों तक वहाँ पर पड़ा रहा था। उसकी माँ रोती रही और उसके चेले यहाँ से वहाँ भागते रहे। लेकिन पिता परमेश्वर का धन्यवाद हो कि कहानी वहाँ पर खत्म नहीं हुई थी। क्योंकि महिमा के तीन दिनों के बाद यीशु मसीह पुनः मुर्दों में से जी उठे थे। उनका यह बलिदान कोई आम बलिदान नहीं था। वह तो सब के लिए मार्ग, सत्य और जीवन बन गया था। और अब हमारे पास उसके द्वारा एक मार्ग है जिससे हम परमेश्वर पिता तक पहुँच सकते हैं। अब उस क्रूस के द्वारा हम उस दूरी को पाप के करण हमारे और पिता के बीच आ गई थी उसे पार करके पिता तक पहुँच सकते हैं। वह तो आज भी हमें पुकार रहा है यह हमारा चुनाव है कि हम उसकी पुकार को सुन कर आते हैं या नहीं। याद रहे यह चुनाव अभी भी हमारा ही है। लेकिन उसे तो हम से अटूट प्रेम किया है जैसा वचन कहता है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया कि जो कोई उस पर विश्वास लाए वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।” हमें तो केवल इतना ही विश्वास करना है कि उसने हमारे पापों की कीमत चुका दी है।

यीशु ने कहा, “आप सत्य को जान लोगे।”

अब कोई जुदाई नही है, न ही मृत्यु का भय और न हीं अब दिलों में छेद हैं। अब हमारे पास अनन्त जीवन है।

आप देखे, परमेश्वर ने मनुष्य को एक चुनाव दिया है। आप उसे स्वीकार करते हैं या उसका तिरस्कार करते हैं यह आप पर निर्भर है।